Tuesday, March 30, 2021

इस बार की होली - मेरी अपनी

 

इस बार की होली - मेरी अपनी

 

खुशियों के रंग और स्नेह की मिठास का प्रतीक पर्व है - होली।

हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी त्यौहार तो अपनी तिथी से आ गया किंतु उत्साह, उल्लास और उमंग के प्रतीक सिमट गए। मन तो पहले से ही अलग अलग चल रहे थे, इस दो गज की दूरी ने शारीरिक दूरियां भी बढ़ा दी है। तकनीकी दूरी कम ना हो इसके चलते कुछ संदेशों का आदान-प्रदान अवश्य हुआ है। इनमें कदाचित 5 प्रतिशत ही हैं जो खुद से लिखे गए हैं, शेष तो किसी के किसी को ही चिपक रहे हैं।

ये सब वैसे तो परिस्थितिजन्य है, किंतु जो चुनिंदा लोग सोंच सकते हैं उनके लिए चिंतनपरक भी है।

इस समय भरतभूमि पर जीवित प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह ऐसा पहला अवसर है जब होली जैसे त्यौहार को मनाने का आधार सरकार द्वारा जारी की गई मार्गदर्शिका है। वास्तव में तो यह पहला अवसर है जब ईश्वर ने निर्णय लेने के सभी अधिकार मनुष्य से छीनकर अपने हाथों में ले लिये हैं। यहाँ तक कि दूसरों से मिलना, उनके साथ समय बिताना, किसी अच्छे स्थान पर घूमकर आना जैसे निर्णय लेने के लिए भी मनुष्य स्वतंत्र नहीं रह गया है।

फिर कैसे खुशियों का रंग लगे? कैसे स्नेह की मिठास अपनों तक पहुँचे? कैसे होली का उल्लास मन को हर्षित करे?

इन प्रश्नों के उत्तर व्यावहारिक तौर पर किसी के पास दिखाई नहीं देते।

चिंतनशील व्यक्ति जब गहराई से विचार करते हैं तो समझ आता है कि ईश्वर ने मनुष्य को खुद को जानने के लिए एवं उस समझ से सामाजिक नवनिर्माण में अपना योगदान देने के लिए सर्वशक्तिमान बनाकर भेजा था। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाए कि मनुष्य ने चालाकी से इस क्रम को बदल दिया है। मनुष्य खुद को जानने से अधिक दूसरों को मानने एवं उनकी समझ के आधार पर विकास के क्रम में लग गया। परिणामतः सामाजिक नवनिर्माण की गति भले ही कम नहीं हुई हो किंतु स्वयं को जानने का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाया।

प्रकृति कहें अथवा ईश्वर, सभी शक्तियाँ इस समय मनुष्य को भीड़ भरे अकेलेपन से नवाचार के एकांत की ओर धकेल रही हैं। एकांत में खुद के पास बैठकर, खुद के विषय में चिंतन करना और उस आधार पर स्वयं को परिष्कृत करने को युगऋषि ने जीवन साधना नाम दिया है।

इस परिष्कृत करने की यात्रा में खुशियों के रंगों के स्थान पर आनंद का रस है, स्नेह की मिठास के स्थान पर अपनों का विश्वास है।

 

इस बार की होली मेरी अपनी हो, जिसमें -

 

खुशियों के रंगों का आभास सीमित ना हो,

अपनों पर अपनों का विश्वास परिमित ना हो।

Friday, April 17, 2020

शिक्षण एवं प्रशिक्षण

"ऑनलाइन केवल प्रशिक्षण हो सकता है शिक्षण नहीं, और बहुत छोटे बच्चों के लिए प्रशिक्षण का आपातकाल नहीं होता|"
फेसबुक पर लिखी गयी इस पंक्ति को पढ़कर कई लोगों ने पहली बार प्रशिक्षण और शिक्षण में अंतर जानने का प्रयास किया| कुछ के लिए तो दोनों लगभग एक जैसे ही होते हैं, दुःख की बात तो ये है कि इन "कुछ" में से कुछ शिक्षण संस्थानों की कुर्सियों को शोभित कर रहे हैं|
साधारण शब्दों में,
प्रशिक्षण (Training) - बाहर से भीतर जाने की प्रक्रिया है, वहीं 
शिक्षण (Teaching) - भीतर से बाहर आने की प्रक्रिया है|
दूसरे शब्दों में,
प्रशिक्षण देने की प्रक्रिया हो सकती है, शिक्षण तो ग्रहण करने की प्रक्रिया है|
समझने की बात ये है कि देने की प्रक्रिया (प्रशिक्षण) में देने वाले की ही भूमिका होती है, ग्रहण करने वाले का या तो  नगण्य अथवा न के बराबर| जबकि ग्रहण करने की प्रक्रिया (शिक्षण) में ग्रहण करने वाले की भूमिका महत्त्व की है, देने वाला (शिक्षक) सबको एक तराजू में नहीं टोल सकता|
एक और महत्वपूर्ण अंतर यह है कि प्रशिक्षण - कौशल विकास की प्रक्रिया है जबकि शिक्षण - व्यक्तित्व विकास की| व्यक्तित्व का विकास बिना सामने बैठाये कैसे संभव है|
इसीलिये शिक्षण का ऑनलाइन होना संभव नहीं|
चूंकि छोटे बच्चों के लिए कौशल विकास का महत्त्व या तो नगण्य है अथवा न के बराबर, इसलिए छोटे बच्चों के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं|

संदीप मेहता ने पिछले लेख पर

निदा फ़ाज़ली की दो पंक्तिया लिखी थी 

बच्चो के हाथो को चाँद सितारे छूने दो,
चार किताबे पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे।

Tuesday, April 14, 2020

मूर्खतापूर्ण समझदारी

हर तरफ होड़ मची है, विद्यार्थियों से ज्यादा व्याकुल विद्यालय हो रहे हैं "ऑन लाइन" कक्षाओं के लिए|
क्या यह वास्तव में विचार पूर्वक लिया गया निर्णय है? उत्तर "हां" भी है और "नहीं" भी| "हां" इसलिए कि जिन विद्यार्थियों को कॉम्पीटिशन अथवा बोर्ड की परीक्षाओं में भाग लेना है उन पर अचानक से अतिरिक्त भार नहीं आ जाए| टाइटल में दी गयी "समझदारी" बस यहीं तक सीमित नहीं है| 
एक बड़े विद्यालय के निदेशक ने कुछ दिन पूर्व फ़ोन पर "ऑन लाइन" कक्षाओं के लिए राय जानने की कोशिश की| वो इस तरह के प्रयोग के विरोधी थे और उसके कारण भी उनने बताये| मेरी भी राय यही थी| आश्वस्त हो गए कि जिन बच्चों को मोबाइल के प्रयोग के लिए सदा से मना करते आये हैं, "ऑन लाइन" कक्षाओं के नाम पर अनावश्यक उस गर्त में डालने का कोई अर्थ नहीं|  साथ ही तर्क यह भी था कि छोटी कक्षाओं के लिए तो इसकी आवश्यकता इसलिए भी नहीं है कि कॉम्पीटिशन या बोर्ड जैसी चिंता उनके लिए नहीं| अच्छा भी है वे इस बहाने अधिक से अधिक समय परिवार के साथ, नवाचार के साथ, अपनी प्रतिभा के साथ बिता सकेंगे|
ऐसी ही राय अन्य विद्यालयों की भी थी| 7 वीं कक्षा तक तो इस तरह का प्रयोग करने की सभी जगह "ना" थी|
 बस समझदारी सैद्धांतिक ही थी|
शेष जो हुआ या तो मूर्खतापूर्ण है अथवा देखादेखी है| दुःख की बात तो ये है कि जो अपनी बात पर कुछ दिन खुद नहीं टिक सकते, उनसे क्या अपेक्षा की जाए बच्चों के भविष्य को लेकर|
बड़े विद्यालय किसी प्रभाव के कारण, मध्यम श्रेणी के उनके दबाव के कारण और शेष देखादेखी|
ये है हमारी मूर्खतापूर्ण समझदारी जिसका आधार या तो चंद लोगों का प्रभाव है, अथवा अपने से बड़ों का दबाव है अथवा केवल देखादेखी| फिर क्यों नहीं निर्णय प्रकृति अपने हाथों में ले| 

Thursday, March 26, 2020

तकनीक का फसाना

तकनीक का फसाना
इक दिन सागर की लहरों में मोती चुनने जा बैठा,
बारिश से भीगी रातों में तारे गिनने जा बैठा,
जा बैठा मैं इन्द्रधनुष से रंग चुरा कर लाने को,
जा बैठा मैं रश्मिरथी को ही दीपक दिखलाने को,

समाधान लेकर निकला था तकनीकों के आलय से,
भागीरथी चली हो जैसे गोमुख और हिमालय से,
मेरा मकसद था खोजूँगा समाधान तकनीकों से,
हर मुश्किल आसान करूंगा कुछ मशीनरी सीखों से,

इस विकास की अंध दौड़ में वही विजयी कहलायेगा,
जो तकनीकों की मंड़ी में खुद पहचान बनायेगा,
मेरा मकसद था मैं भी ऐसी तकनीक बनाउँगा,
अपने श्रेष्ठ प्रयासों से मैं बुझते दीप जलाउँगा,

यही सोंच निकला था मैं लेकर तकनीकों का बस्ता,
हर मुश्किल आसान करूँगा समाधान होगा सस्ता,
पहला कदम रखा था गाँवों के सुंदर गलियारों में,
खुशियाँ लेकर आउँगा मैं हर आंगन चौबारों में |

गाँव पहुंचा ही था कि एक बुजुर्ग मिल गये,

प्रस्तुत कविता उन्ही से वार्तालाप है,

जिसे वरदान समझ कर चल रहा था, मुझे लगा वही अभिशाप है।

वे बोले, लगता है तुम भी कुछ लाये हो,
अपनी तकनीकों से हमारी झोली भरने आये हो,
मेरी खुशी खुद खिलखिलाने लगी,
शुरुआत ही अच्छी सी नज़र आने लगी,
ऐसा लगा जैसे कोई मेरी राह तक रहा था,
कदाचित उसका समाधान मेरी तकनीक में ही अटक रहा था,
किंतु कुछ देर की बातचीत में ही मेरा भ्रम दूर हो गया,
तकनीक पर जो अभिमान था चूर चूर हो गया |

वे बोले, क्या तुम गाँवों की गलियों को पहचानते हो?
इन गलियों के वैभव को जानते हो?
क्या तुम्हें पता है, संस्कृति नामक मोहल्ला अब भी गाँव में ही है?
जमीन को उपजाऊ बनाने की तकनीक इन पशुओं के पाँव में ही है?
अरे बेटा, हम सब मस्त थे, हम सब खुश थे अकेले में,
हमारी अगली पीढ़ी ही उदास सी बैठी है तकनीकों के झमेले में,

सुनो, तुम्हें लेकर चलता हूँ उन यादों के झरोखों में,
शायद कुछ पानी छलके तुम्हारी भी पलकों में,

गलती को तो हमने बार बार दोहराया है,
खुशियों के लालच में कितनी ही बार अपनों को गंवाया है,
मुगलों ने लालच दिया, आक्रांता बन छा गए,
हमारे ही घर में घुसकर, हमको ही चूना लगा गए,
हमारा अभिमान, हमको अपमानित कर गया
हमारा लालच, अपने ही भाईयों के लिए मन में ज़हर भर गया,
पड़ौसी के घर में लगी आग पर तालियाँ बजाने लगे,
फिर उसी आग की लपटों से अपने ही घर में मातम मनाने लगे,
वो तो अच्छा है हम उस संस्कृति के दामन में हैं,
जो आदमी के नहीं बल्कि ईश्वर के संरक्षण में है,
हम बच गए और बढ़ गये,
क्योंकि हमारे कुछ पुरखे संस्कृति को बचाने लड़ गए,
सब कुछ ठीक होता इससे पहले ही हमने इतिहास दोहराया,
अंग्रेजों के दिये लालच के सामने खुद को बौना पाया,
हमारे ही घर में घुसकर हमको लूट लिया,
शहीदों की शहादत पर हमने फिर से ज़हर का घूंट पिया,
रक्त की बूंदों से रक्तरंजित हिंदुस्तान हो गया,
मातृभूमि का एक टुकड़ा पाकिस्तान हो गया,
खो गये थे हम मगर पहचान बाकी रह गयी,
लुट गया सब संस्कृति की शान बाकी रह गई,
गांधी, आज़ाद, भगत जैसे अनगिनत यौद्धा थे,
राष्ट्र की पहचान सहेज कर रखने वाले पुरोधा थे,
फिर से बच गये राष्ट्र और राष्ट्रीयता,
सैंकड़ों कुर्बानियाँ देकर बची थी अस्मिता,
मगर हम तो कालिदास के देश में रहते हैं,
खुद अपनी ड़ाली काटने वाले को महाकवि कहते हैं,
इस सदी ने अपनी वही आदतें दोहराई,
घुसपैठियों की भीड़ उसी आदत के कारण हमारे घर में फिर घुस आई,
बीती सदियों तक आक्रांता शरीरधारी थे,
इस सदी के दानव सम्पूर्ण मनुष्यता पर भारी थे,
हमारे धैर्य का इम्तहान था,
सामने समय बचाने वाला तकनीकी समाधान था,
यह तकनीक रूपी अमानवीय चिन्तन हमें इतना भाया
अब तक हम घुसपैठियों के सामने केवल झुकते थे, इस बार पूरा शीर्षासन लगाया,
व्यक्तिगत से लेकर सामाजिक विकास के नाम पर,
तकनीकें भारी पड़ने लगी, परिश्रम से किये गये काम पर
लोभ और लालच के चश्मे ने दूर दृष्टि छीन ली,
अधिक पाने की चाह ने मेहनत से बनाई हमारी सृष्टि छीन ली,
तकनीकों के स्वागत में हमनें पलकें तक बिछा दी,
जो भी बाधाएं आई, चुटकियों में हटा दी,
बदले में जो मिला उसे दिवालियापन कह सकते हैं,
जिनके पास थोड़ा बहुत था उन्हें अब निर्धन कह सकते हैं,
छीन लिया जमीन का उपजाऊपन,
पशुओं के भीतर का छिपा हुआ धन,
पक्की सड़क बनी तो शहर हुआ करीब,
मोची, खाती, दर्जी सबके सब हुए गरीब,
और तो और बाल भी शहर जाकर कटते हैं,
जो पैसे गांव में रह जाते थे, अब शहर में ही बंटते हैं,
तुम्हारी तकनीक के कारण पानी के लिए दूर तो नहीं जाना पड़ता,
किंतु मेरे गांव के मीठे पानी का कुंआ खुद ही अपनी किस्मत से लड़ता,
तुम कहते हो हमारे पास संसाधन नहीं थे,
अरे, बिना संसाधनों के भी हम निर्धन नहीं थे,
किसी एक के घर की खुशी सबके चेहरे पर होती थी,
मातम किसी के भी घर में हो, हर आंख रोती थी,
माना, तन की दिखाई देने वाली बीमारियाँ काबू में आयी है,
पर बदले में मन ने न दिखने वाली कितनी ही झंझाएं पायी है,
अपना खेत था, अपना खलिहान था,
हम सबका एक मैदान था,
वो नदी पर नहाकर खेलने जाना,
बारिश में भीगकर जोर से चिल्लाना,
होली में एक साथ सबको रंग लगाना,
दीवाली पर किसी के भी पटाखे चलाना,
क्या बतायें, अब तो त्यौहारों की बधाई तक तकनीकी हो गयी है,
मेहमानों के इंतज़ार में मिठाई तक फीकी हो गई है,
शहर में रहने की इच्छा या अधिक पाने की चाह,
हमारी अगली पीढी को नहीं भाती अब गांव की पनाह,
यह सच है कि तकनीक के इस दौर में जीना आसान हो गया है,
किंतु तकनीकें खरीदते खरीदते इंसान खुद एक सामान हो गया है,
थोड़ी सी जमीन के कारण अपने ही घर में लहुलुहान हो गया,
संवेदना के अभाव में अब हर घर एक मकान हो गया,
गरीबी मिटाने के सपने में आम आदमी इस कदर लुटा है,
जिसके पास पैसा, तकनीक उसी की और वही ऊपर उठा है,
बिना पसीने निकाले काम करने की तकनीक हमको ऐसी भाने लगी है,
खेतों खलिहानों में काम करने में अब शर्म आने लगी है,
पहले तो आज़ादी मिल भी गई थी,
मुरझाई हुई कलियाँ खिल भी गई थी,
उस समय, गुलामी की बेड़ियों में जकड़ने वाले सामने खडे थे,
हम अपना साहस और वो अपनी मंशा लिए अड़े थे,
आज तो ऐसी महाभारत है जिसमें दोनों ओर हम ही हैं,
तकनीकी दासता के संवाहक भी हम और ग्राहक भी हम ही हैं,
तुम्हारी ही भाँति एक बार एक पढे लिखे ने हमको समझाया था,
वही जो पहली बार तकनीकी जादू लेकर आया था,
यह विज्ञान के बड़े प्रयोग हैं, आपके बड़े काम आयेंगे,
अब लगता है वे प्रयोग हमारे नहीं, हम ही उनके काम आयेंगे,
बोला था, हमारे ये प्रयोग वो दीपक हैं जो हर घर को रोशन कर देंगे,
समय भी बचेगा और सब की झोली खुशियों से भर देंगे,

इस तकनीकी सदी में हमने क्या पाया यह तो हम नहीं जानते हैं,
किंतु वह बचा हुआ समय और खुशियों की झोली आज भी तलाशते हैं।

Saturday, November 10, 2018

मेरा इमली का पेड़

पेड़ तो कई थे गाँव में, जैसे हर जगह होते हैं,
किन्तु इमली के इस पेड़ के साथ तो न जाने कितने बचपन बीते हैं।
नदी के किनारे से बस थोड़ी दूर, हमेशा इमली से भरपूर,
हम सब मिलकर इसे सींचते थे, और फिर इसपर लटककर इमली खींचते थे।

हर दिन नदी पर एक घण्टे नहाना, इमली के इस पेड़ को थोड़ा पानी पिलाना, 
कुछ देर इसकी छाँह में बतियाना और फिर घर चले आना।

अब तो खैर बरसों बीत गए, गाँव छोड़ शहर के जो गए।

आज अचानक रमेश का फोन आया, ऐसा लगा जैसे बचपन ही लौट आया।

रमेश भी तो मेरी तरह शहर चला आया, बचपन की यादें और इमली का पेड़ वह भी वहीं छोड़ आया।

फोन पर ही तय हो गया, सपरिवार गाँव जाएंगे,
हम भी देखेंगे और बच्चों को भी हमारे उस दोस्त से रुबरु कराएंगे।

गाँव गए, सुबह हुई, नदी की ओर चल दिये,
किन्तु वहाँ पहुँचते ही समय ने एकसाथ कई प्रश्न खड़े कर दिये।

सूखा हुआ नदी का किनारा लोगों की राह निहारता ऐसा छटपटा रहा था, जैसे कोई भूखा इंसान खाने के लिए तड़फ रहा हो।

और हमारे आगमन का केंद्र, हमारा प्यारा इमली का पेड़,
वह तो नाउम्मीदी का दामन ऐसे थामे था जैसे आँसू भी सूख चुके हों,
पत्तियों की तो क्या कहें उसके तने भी मानो सूख़सूखकर ऊब चुके हों।

लेकिन हमें देखते ही उसे लगा जैसे उसकी आत्मा लौट आयी हो,
और हमको लगा जैसे हमारे ही कारण उसको मौत आई हो।

आज भी उसे तो कोई शिकायत नहीं थी, शायद उसकी हमारे लिए और हमारी उसके लिए चाहत यही थी।

बिना पूछे ही फफककर बोला,

तुम्हारे बचपन की किलकारियों के बाद, कदाचित तुम्हारे यौवन के एक बसंत के बाद,
एक वर्ष ऐसा सूखा आया, फिर पानी तो क्या कोई इंसान भी हमसे मिलने नहीं आया।

मेरी इमलियाँ तुम्हारा इंतज़ार करती रहीं, फिर एक दिन वे भी पत्तियों को साथ ले मुझे छोड़कर चली गई।

तुम्हारे शहर जाने के बाद कभी कभार, मोहन और सोहन आ जाते थे, भारी गर्मी के थपेड़ों में हमको राहत का पानी पिला जाते थे।

किन्तु सुना है अब तो व्यस्तता में ऐसे पिघल रहे हैं, उनके माँ बाप तक भी वृद्धाश्रम में पल रहें हैं।

व्यस्तता में तुम लोग परिवार की गाड़ी को जब ठीक से नहीं खींच पा रहे हो,
फिर मैं एक साधारण वृक्ष कैसे सोंचूं कि तुम मुझे सींच पा रहे हो।

मैं दबे पांव चला तो आया किन्तु ऐसा लगता है जैसे मन से आज भी वहीं हूँ,
कटाक्ष था या यथार्थ था, जो भी हो सच है कि जैसा मेरा बचपन था अब मैं नहीं हूँ।

अगर मैं वही होता तो
मेरा गाँव भी मेरा होता, नदी का किनारा भी क्यों रोता,
उस पेड़ का तो पता नहीं किन्तु संस्कृति को कदाचित ऐसे न खोया होता।

Friday, January 20, 2017

शिक्षण विचार

क्या मैं "वही" शिक्षक हूँ?
क्या मैं "वही" शिक्षक हूँ जिसकी गोद में प्रलय और निर्माण दोनों पलते हैं? वह जो एक राजा को भरी सभा में खुली चुनौती देकर भारत की अखंडता का प्रण लेता है। वही हठी कौटिल्य जो अपने शिष्यों को माँ भारती का ऐसा ओजस्वी चित्रण प्रस्तुत करता है जिससे शिष्य के भीतर निहित संभावनाएं भारतीयता के उन्मुक्त शिखर पर पहुँचने को मचलने लगती हैं।
क्या मैं वही शिक्षक हूँ जो शिष्य के भीतर छिपी प्रतिभा को निखारने एवं उसे राष्ट्र निर्माण की धारा से जोडने का रत्ती मात्र भी कार्य कर रहा हूँ? स्वामी विवेकानंद के अनुसार तो शिक्षा अन्तर्निहित क्षमताएं ही हैं, और ऐसे में मेरा (शिक्षक का) तो कार्य ही उन क्षमताओं से शिष्य का परिचय कराना है।
क्या मैं वही शिक्षक हूँ जिसकी गरिमा इतनी उच्च थी कि भारतीय गणतंत्र का प्रथम व्यक्ति स्वयं के लिए वही संबोधन चुनता है?
क्या वही हूँ मैं, जो डॉ राधाकृष्णन को अपनी समस्त योग्यताओं और विभूतियों के श्रेष्ठ संबोधन के रूप में दिखाई पडता है? क्या मैं ही सपनों को अपना बनाकर उनके साथ जीने की राह बताने वाला कलाम हूँ?
क्या मैं उसी वंश का वंशज हूँ जिसमें रवीन्द्रनाथ टैगोर, सावित्री बाई फुले, आशिमा चटर्जी और डॉ प्रणव पन्ड्या जैसे श्रेष्ठ विचारक रहे हैं? परिवर्तन की चाह पैदा कर उसकी राह दिखाने वाला, क्या मैं वही शिक्षक हूँ?
जी हाँ, हूँ तो मैं वही, उसी माँ वाणी का ज्येष्ठ पुत्र जो श्रेष्ठ सृजन के लिए बसंत के मौसम की भाँति सदा लालायित रहता है।
अन्तर इतना भर आ गया है कि जिस राजनीति को हस्ताक्षर बनाकर मैने कभी चाणक्य बन शंखनाद किया था, आज उसी राजनीति के कुछ हस्ताक्षरों ने मुझे मोहरा बना रखा है। मेरा स्वाभिमान, मेरा उत्साह, उमंग, विचार, भाव, क्रियाशीलता जैसे गुण मेरे स्थानांतरण अथवा मेरी पदोन्नति हेतु रिश्वत के रूप में दिए जा चुके हैं। मेरी गलती इतनी अवश्य रही कि मैने शिक्षक के पद को गुरु की पदवी के स्थान पर एक नौकरी की संज्ञा दे डाली। कदाचित इसीलिए मुझे भी दूसरे नौकरशाहों की तरह आरामपसंद जीवन जीना और शाही ठाठ बाठ अच्छे लगने लगे।
मेरा "शुभ" भी "लाभ" में बदल गया, और इससे पहले कि मैं संभल पाता, मेरे कुल के कुछ दीपकों ने इसे "लाभ" से "लोभ" में बदल दिया।
वे वंशज जिन्हें राजनीति ने मोहरा बना कर रखा था, अब लोभ के कारण धनवानों की भी दहलीज पर सर झुकाए खडे दिखाई देते हैं। मेरे कुल का जिन्हें गौरव होना था अब वे ही कौरव बने बैठे हैं। मुझे दुख है कि महाभारत के उस समय की भाँति आज भी इनकी संख्या अधिक होने के कारण ये ही मेरी पहचान भी बने बैठे हैं।
किन्तु मुझे विश्वास है, मेरे तरकश पर, जिसमें सद्गुणों के तीर भरे हुए हैं। बस कुछ समय और, फिर एक ज्ञान की गंगा बहाने वाला कृष्ण मुझे मेरे कर्मपथ की याद दिलाएगा। मेरे तरकश में रखा एक-एक तीर सद्गुण की भाँति बाहर निकलकर एक बार पुनः भारत को महाभारत बनाएगा। मैं मुक्त हो जाउँगा, राजनीतिकों की जंजीर से और धनवानों की दहलीज से।
ऐसा भी नहीं है कि इस समय बैठा मैं अपने कृष्ण का इंतजार ही कर रहा हूँ। मैने तो अपना कार्य आरंभ कर दिया है, उसी प्रकार जिस प्रकार उस काल में किया गया था। मैं भी इस समय के धर्म अर्थात मानवता की रक्षा हित तैनात मेरे साथियों (शिक्षकों) को एकजुट करने में लगा हूँ। मेरी तैयारी चरम पर है, मैं अपने तरकश के तीर भी एकत्रित कर रहा हूँ, और ऐसे साथी भी इकट्ठे कर रहा हूँ जो इस आध्यात्मिक विचारधारा के समर्थक हैं।
योगेश्वर के आने भर की देर है, वे ही भावी महाभारत हेतु मुझमें विश्वास जगाएंगे। मानवतावादी धर्म पुनः स्थापित होगा और मैं पूर्ण आत्मविश्वास, संपूर्ण मनोबल और सभी शक्तियों को एकत्र कर उद्घोष करूँगा -
"जी हाँ, मैं वही शिक्षक हूँ"।