Friday, January 20, 2017

शिक्षण विचार

क्या मैं "वही" शिक्षक हूँ?
क्या मैं "वही" शिक्षक हूँ जिसकी गोद में प्रलय और निर्माण दोनों पलते हैं? वह जो एक राजा को भरी सभा में खुली चुनौती देकर भारत की अखंडता का प्रण लेता है। वही हठी कौटिल्य जो अपने शिष्यों को माँ भारती का ऐसा ओजस्वी चित्रण प्रस्तुत करता है जिससे शिष्य के भीतर निहित संभावनाएं भारतीयता के उन्मुक्त शिखर पर पहुँचने को मचलने लगती हैं।
क्या मैं वही शिक्षक हूँ जो शिष्य के भीतर छिपी प्रतिभा को निखारने एवं उसे राष्ट्र निर्माण की धारा से जोडने का रत्ती मात्र भी कार्य कर रहा हूँ? स्वामी विवेकानंद के अनुसार तो शिक्षा अन्तर्निहित क्षमताएं ही हैं, और ऐसे में मेरा (शिक्षक का) तो कार्य ही उन क्षमताओं से शिष्य का परिचय कराना है।
क्या मैं वही शिक्षक हूँ जिसकी गरिमा इतनी उच्च थी कि भारतीय गणतंत्र का प्रथम व्यक्ति स्वयं के लिए वही संबोधन चुनता है?
क्या वही हूँ मैं, जो डॉ राधाकृष्णन को अपनी समस्त योग्यताओं और विभूतियों के श्रेष्ठ संबोधन के रूप में दिखाई पडता है? क्या मैं ही सपनों को अपना बनाकर उनके साथ जीने की राह बताने वाला कलाम हूँ?
क्या मैं उसी वंश का वंशज हूँ जिसमें रवीन्द्रनाथ टैगोर, सावित्री बाई फुले, आशिमा चटर्जी और डॉ प्रणव पन्ड्या जैसे श्रेष्ठ विचारक रहे हैं? परिवर्तन की चाह पैदा कर उसकी राह दिखाने वाला, क्या मैं वही शिक्षक हूँ?
जी हाँ, हूँ तो मैं वही, उसी माँ वाणी का ज्येष्ठ पुत्र जो श्रेष्ठ सृजन के लिए बसंत के मौसम की भाँति सदा लालायित रहता है।
अन्तर इतना भर आ गया है कि जिस राजनीति को हस्ताक्षर बनाकर मैने कभी चाणक्य बन शंखनाद किया था, आज उसी राजनीति के कुछ हस्ताक्षरों ने मुझे मोहरा बना रखा है। मेरा स्वाभिमान, मेरा उत्साह, उमंग, विचार, भाव, क्रियाशीलता जैसे गुण मेरे स्थानांतरण अथवा मेरी पदोन्नति हेतु रिश्वत के रूप में दिए जा चुके हैं। मेरी गलती इतनी अवश्य रही कि मैने शिक्षक के पद को गुरु की पदवी के स्थान पर एक नौकरी की संज्ञा दे डाली। कदाचित इसीलिए मुझे भी दूसरे नौकरशाहों की तरह आरामपसंद जीवन जीना और शाही ठाठ बाठ अच्छे लगने लगे।
मेरा "शुभ" भी "लाभ" में बदल गया, और इससे पहले कि मैं संभल पाता, मेरे कुल के कुछ दीपकों ने इसे "लाभ" से "लोभ" में बदल दिया।
वे वंशज जिन्हें राजनीति ने मोहरा बना कर रखा था, अब लोभ के कारण धनवानों की भी दहलीज पर सर झुकाए खडे दिखाई देते हैं। मेरे कुल का जिन्हें गौरव होना था अब वे ही कौरव बने बैठे हैं। मुझे दुख है कि महाभारत के उस समय की भाँति आज भी इनकी संख्या अधिक होने के कारण ये ही मेरी पहचान भी बने बैठे हैं।
किन्तु मुझे विश्वास है, मेरे तरकश पर, जिसमें सद्गुणों के तीर भरे हुए हैं। बस कुछ समय और, फिर एक ज्ञान की गंगा बहाने वाला कृष्ण मुझे मेरे कर्मपथ की याद दिलाएगा। मेरे तरकश में रखा एक-एक तीर सद्गुण की भाँति बाहर निकलकर एक बार पुनः भारत को महाभारत बनाएगा। मैं मुक्त हो जाउँगा, राजनीतिकों की जंजीर से और धनवानों की दहलीज से।
ऐसा भी नहीं है कि इस समय बैठा मैं अपने कृष्ण का इंतजार ही कर रहा हूँ। मैने तो अपना कार्य आरंभ कर दिया है, उसी प्रकार जिस प्रकार उस काल में किया गया था। मैं भी इस समय के धर्म अर्थात मानवता की रक्षा हित तैनात मेरे साथियों (शिक्षकों) को एकजुट करने में लगा हूँ। मेरी तैयारी चरम पर है, मैं अपने तरकश के तीर भी एकत्रित कर रहा हूँ, और ऐसे साथी भी इकट्ठे कर रहा हूँ जो इस आध्यात्मिक विचारधारा के समर्थक हैं।
योगेश्वर के आने भर की देर है, वे ही भावी महाभारत हेतु मुझमें विश्वास जगाएंगे। मानवतावादी धर्म पुनः स्थापित होगा और मैं पूर्ण आत्मविश्वास, संपूर्ण मनोबल और सभी शक्तियों को एकत्र कर उद्घोष करूँगा -
"जी हाँ, मैं वही शिक्षक हूँ"।

Monday, February 11, 2013


Divine India Youth Association (DIYA)

A tribute to Swami Vivekanand on 150th anniversary.

http://www.youtube.com/watch?v=S_90RPzkZRY


A movement initiated by Dev Sanskriti University (www.dsvv.org), Shantikunj, Haridwar to create Divine India by year 2020, by unleashing the Youth potential and directing the same to righteous path.

Monday, January 2, 2012

शिक्षा


माँ वाणी का ह्रदय अंश मैं, शब्दों की परिचायक हूँ,

शिक्षा मुझको नाम मिला मैं संस्कृति का नायक हूँ |

मैं ब्रह्मा  का ब्रह्मज्ञान  हूँ, नारायण का दिया दान हूँ,

जिसको पूजा जटारूप में, मैं शंकर का दिव्य भान हूँ |

मैंने ही संस्कार दिए हैं, धर्म कर्म त्यौहार दिए हैं 

वसुंधरा के हर ज़र्रे को मौलिक हर अधिकार दिए हैं |

बिन मेरे भगवान अधूरा, वेदों का भी ज्ञान अधूरा,

उपनिषदों और आर्षग्रंथ को, मिला है जो सम्मान अधूरा |

मैंने पूर्ण किया भाषा को, हर बच्चे की अभिलाषा को,

अन्धकार से घिरी निशा में, जलते दीपों की आशा को |

मुझसे ही तो है कुरान, गुरु के ग्रंथों का ग्रंथज्ञान,

हो बाइबिल का शब्द शब्द, चाहे गीता का  ब्रह्मज्ञान  |

रामचरित हो तुलसी की या बाल्मिकी रामायण हो,

वेदव्यास की रचित कथा या किसी छंद का गायन हो |

तक्षशिला का मैं हूँ चेहरा, नालंदा के सर का सेहरा,

रामकृष्ण की इस धरती पर गौरवमयी इतिहास है मेरा |

बिन मेरे बोलो राम कहाँ, माँ मीरा का घनश्याम कहाँ,

नानक कबीर के दोहों का, मेरे बिन कोई दाम काम कहाँ |

आज़ादी हासिल करने जब वीरों ने कलम संभाली थी,

उस हवनकुंड की अग्नी में मैंने भी समिधा डाली थी |

जब सजा तिरंगा दिल्ली पर, वीरों की अमर कहानी का,

वह उत्सव था आजादी का, हर हर्षित हिन्दुस्तानी का |

मैं अपने को बहला न सकी, थी कोने में खामोश खड़ी,

क्या हट पायेगी मुझ पर से, जो पाश्चात्य की परत चढी |

मैं जुदा हो गयी विध्या से, अब मन अन्दर तक रोया है,

पहचान गयी तो गम न था, अब स्वाभिमान भी खोया है |

अब रामानंद का राम बचा वह तुलसी का श्रीराम कहाँ,

क्या होगा पूजा स्थल का अब रजनी है घनश्याम कहाँ |

वह पतिव्रता पांचाली अब तो चीर हरण में दिखती है,

माता सीता के चित्रों संग बस अगरबत्तियां बिकती है |

मैं गंगाजल सी थी पवित्र, था श्वेत धवल मेरा चरित्र,

अब जो प्रतिवेश मिला मुझको, अपनों में मैं लगती विचित्र |

मेरे मंदिर के गलियारे अब सुस्त दिखाई पड़ते है,

बच्चे मस्ती करते थे जहाँ, शिक्षक आपस में लड़ते हैं |

मेरी गरिमा का ह्वास हुआ, मेरे अपने ही आँगन में,

अब संस्कृति की झलक कहाँ, प्यारे बच्चों के क्रंदन में |

गांधी पूछो तो राहुल है, और अजय बना है भगत सिंह,

गुरु तेगबहादुर भूल गए, सरदार याद हरभजन सिंह |

जब कलमकार ही भूल गए, सद्ज्ञान हूँ में सामान नहीं,

जिनने फूलों में रखा मुझको, उनको भी मेरा भान नहीं |

मैं कठपुतली सी बन बैठी, अपने ही कैद विचारों में,

मेरे अपने ही जनक थे जो अब बेच रहे बाजारों में |

थी संस्कारों की वह होली, रस की फुहार, रंगों का प्यार,

अब फूहड़ता ने बदल दिया, उस सुखद पर्व का वह खुमार |

मेरी दीवाली दीपसजित हर और था खुशियों का प्रकाश,

अब मन अंधियारा दिखता है, आतिश से भले जलता आकाश |

थी मैं ममता, करुणा,  समता, संबंधों की मैं स्नेहलता,

अब झंझाओं के घोर प्रलय में, शेष रह गयी चंचलता |

थे नैतिक मूल्यों की खातिर जो मिटने को तैयार खड़े,

मानवता की रक्षा के हित जो शिक्षक हर दीवार चढ़े |

अब वे ही मेरे परम पूज्य, मुझको शर्मिंदा करते हैं,

संस्कृति की भाषा झुठलाकर, मेरा घर गंदा करते हैं ||

Saturday, December 31, 2011

अहसास


एक और वर्ष बीता, कोई हारा कोई जीता

किसी ने पाया किसी ने खोया, कोई मुस्कुराया तो कोई रोया |

जिसने खोया उसके लिए सागर की गहराई जैसा,

जिसने पाया उसके लिए रेत के टीले की ऊंचाई जैसा |

खोने और पाने की जद्दोजहद में बदलाव भी हुए,

कुछ को मरहम मिला तो कुछ को घाव भी हुए |

परिवर्तन का सिद्धांत तो वही है, कदाचित भाषा नयी है,

कोशिशें की भी बहुत संभालने की, नदी फिर भी उसी दिशा में बही है |

देखकर सीखें या सीखकर देखें, यही भ्रम बना रहा,

चिरंतन से चला जो आ रहा, वही क्रम बना रहा |

मैं भी बीते वर्ष के साथ, जिधर मोड़ा उधर मुड़ गया,

हाँ, इसी बीच एक वर्ष का अनुभव साथ जुड़ गया |

अनुभव एक कडवे सत्य के सामान था,

सत्य ऐसा जिसे देख मैं खुद हैरान था |

जो भी नैतिकता की चादर ओडे सदाचार सिखलाते थे,

वो वसुंधरा के ज्येष्ठ पुत्र अपना बाज़ार चलाते थे |

जिनके जीवन संघर्ष को सतत प्रणाम किया,

सोचा ये वही सितारे हैं जिनने सच का सम्मान किया |

सच की खातिर लड़ने को ही  जो अपनी शान बताते है,

जब उनकी बारी आती है अपनी ही आन बचाते है |

बड़ा बनने की चाहत में वहां भी ईमान बिकते देखा,

पैसे का लेन देन ना भी हो पर स्वाभिमान बिकते देखा |

गंगाजल से दिखने वाले ये भी गन्दा पानी निकले,

चिरंतन से सुनी जा रही कहानी निकले |

 बड़ा बनने की इस राह में अब मेरे सम्मुख प्रश्न खडा है,

झंझाओं के इस प्रपात में, स्वार्थ बड़ा या राष्ट्र बड़ा है |

समय रहते कदाचित इस भ्रमरजाल से मैं निकल आया,

डगमगाते क़दमों के बीच इस चकाचौंध में मैं संभल पाया ||

Friday, December 30, 2011

नव वर्ष मंगलमय



लेकर मशालें चल पड़ें गर राष्ट्र के निर्माण हित 


तो भ्रष्टता की हवा का रुख ही बदलता जाएगा |

नव वर्ष में गर हर युवा एक दिया बन दिखलाए तो

विकसित वतन का स्वप्न भी साकार होता जाएगा ||

नव वर्ष की अनंत शुभकामनाओ सहित   

Wednesday, December 28, 2011

नूतन वर्षाभिनंदन


 इस नए वर्ष का नव प्रकाश, फैलाये क्रांति विचारों की,

हर युवा सृजन सैनिक बनकर बारिश कर दे अंगारों की |

अंगारे ज़िम्मेदारी के, सच, स्वाभिमान, खुद्दारी के,


तब गूँज उठेगी चहुँ ओर, जय भारत माँ के नारों की ||

Friday, October 21, 2011

एक तुलनात्मक कविता

एक ऐसी कविता जो एक तुलना है, न मेरे विचार है, न मेरे शब्द हैं  | हाँ, लिखने का श्रेय फिर भी मुझे ही है |

 जो  बीत गया  वो बना  रहा ….

 जीवन  में  एक  सितारा  था
 मुझको वो  बेहद  प्यारा  था 
वो चला  गया  वो  डूब  गया 
अम्बर  का  आँगन  भी  रोया 
 जब  भी इसका  तारा  टूटा 
जब  भी  इसका  प्यारा  छूटा
मैंने  हर  टूटे  तारे  पर 
अम्बर को  रोते  देखा  है 

जो  बीत गया  वो बना  रहा ….

जीवन  में  था  वो  एक  सुमन 
थे  उस  पर  नित्य  न्योछावर  हम
वो  बिखर  गया  वो सूख  गया 
वो  प्यारा  मुझसे  रूठ  गया 
मधुबन  का  भी  तो  हाल  यही 
जब  भी  सूखी  इसकी  कलियाँ 
जब  तक  मुरझाई  खिली  नहीं 
मुरझाये  सूखे  फूलों  पर 
मधुबन  भी  शोक  मनाता  है

जो  बीत गया  वो बना  रहा ….

जीवन  मधुरस  का  प्याला  था 
 हमने  तन  मन  दे  डाला  था 
 वो  छूट  गया  वो  टूट  गया 
 मदिरालय  का  मन  भी  देखो 
जब  भी  कोई  प्याला  हिलता  है 
जब  मिटटी  मे मिल  जाता  है 
नए  प्याले  की  आहट तक 
मदिरालय भी  पछताता  है 


जो  बीत गया  वो बना  रहा ….

मृदु  मिटटी  के  जो  बने  हुए 
मधुघट  जब  फूटा करते  है 
एक  छोटा  सा  जीवन  इनका 
फिर  क्यों  ये  टूटा  करते  है 
मदिरालय  के  अन्दर  भी  तो 
मधुघट  मधु  के  ही  प्याले  है 
ये  मादकता  से  भरे  हुए 
वो  मधु  से  प्यास  बुझाते  है 
वो  पीनेवाला  ही  कैसा 
प्यालों  से  जिसको  प्यार  न  हो                                                         
जो  सच्चे  मधु  का  प्यासा  है 
वो  रोता  है  चिल्लाता  है 

जो  बीत गया  वो बना  रहा ….