Friday, November 12, 2010

अजन्मी आत्मा

इक अजन्मी आत्मा ने बादलों की ओट से
देखा विदारक दृश्य तो वह खिलखिलाकर हंस पड़ी

था स्वप्न या कटु सत्य यह, कैसा विहंगम दृश्य यह
दे चुनौती ईश को, मानव भविष्य बना रहा

जन्म कितना सुखद है उस बेजुबां से जीव का
पैदा हुआ तो कलेक्टर पैदा हुई तो डॉक्टर

हर तरफ आलोक है, हर घर प्रफुल्लित हो रहा
मौन सा वह जीव बस, आभार की मुद्रा लिए

कैसा सुखद परिवेश और स्वछंद सा प्रतिवेश भी
हर घडी यह लग रहा आज़ाद हर एक सांस है

पर क्या पता था क्या खबर, आज़ाद जो ये सांस है
हर किसी के ह्रदय में इस जीव से कुछ आस है

छद्म सा स्वातंत्र्य था वह स्वप्न सा व्यवहार था
उसके भविष्य का हर एक पल तो एकदम तैयार था

बन गया वह जो बनाया, रच गया जैसा रचाया
पढ़ गया जो कुछ पढ़ाया, खेल खेला जो खिलाया

समझ के जब दायरे में पहुंचकर देखा अतीत
तब समझ आया, उजाला दिख रहा था, था नहीं

जग ने उसे था बना डाला या स्वयं ही बन गया
क्या पता वह क्या बना इंसान पर बन ना सका

Sunday, November 29, 2009

जिंदगी

जिंदगी क्या नाम दूँ तुझे, कैसे परिभाषित करूँ....
कैसे कहूं कि तू इक खुली किताब है...

शायद कभी सोंचा भी हो, मन की अभिलाषा भी हो,
कभी झूंठ के दामन को छूने नही दूँगा, कठिनाइयों का सागर भी हो तो सह लूँगा,
चमकते उस ध्रुव की तरह, दमकती चांदनी की तरह, सत्यता और पवित्रता की चमक को बनाये रखूंगा,
श्वेत झरने की तरह, बहती नदिया की तरह, निर्मलता को मन में संजोये रखूंगा...

किंतु आज इस ज़माने की हवा मुझे भी लग गयी,
मेरा स्वाभिमान मेरी सच्चाई हवा के साथ बह गयी....
जमाने की हवा ने मुझे भी हिला दिया, सत्यता के मार्ग से इस आत्मा को डिगा दिया...

जहाँ भी गया, दो रास्ते दिखायी दिए,
सच और झूंठ, दोनों नए थे मेरे लिए...
जो आसान था उधर ही चल दिए, सच ने एक बार फिर नैन भिगो लिए॥
सब कुछ मिला, मिलता ही रहा, खुशियों का उपवन फलता ही रहा,
न था तो सिर्फ़ सत्य और स्वाभिमान, इंसानियत और स्वयं की पहचान...

आज इस मोड़ पर आकर, एक सच्चे स्वाभिमानी को पाकर...
दुःख के बादलों ने खुशियों की रौशनी को मिटा दिया,
जलते हुए दिए को हवा के इक झोंके ने अन्धकार बना दिया॥
हिम्मत नही थी की नज़र भी मिला सकूं....
आज लगा की ऐ जिंदगी, जो वादा किया था तुझसे, मै पूरा न कर सका,
तुझे इस दलदल में डालकर, मै सबकुछ हार गया...

काश की उस पहले दोराहे पर, उस जिंदगी के मोड़ पर,
मन की संवेदना का स्वर मैं सुन पाता,
तुझे भी नाम दे पाता, मै भी मनुष्य बन जाता॥



Friday, May 22, 2009

लड़की

चंद्रमा से चाँदनी, पृथ्वी से धैर्य
अग्नि से चपलता, वायु से सरसता
पुष्प से सुगंधि, मधु से माधुर्य
दीप से ज्योति और सीप से मोती लेकर तस्वीर में उतारा होगा
तब कहीं परमात्मा ने लडकी को बनाया होगा

लड़की यदि
माँ है तो ममता का दुलार है
बहिन है तो भाई का प्यार है
काकी है तो कर्तव्य का निखार है
पत्नी है तो पति का श्रृंगार है

प्रेम की परीक्षा में मीरा है
धैर्य की समीक्षा में सीता है
धैर्य टूट जाए तो दुर्गा है
साथ छूट जाए तो पद्मिनी है
दुखियों की सेवा में टेरेसा है
देश की रक्षा में लक्ष्मी बाई है

मगर हाय रे इश्वर है विधाता
तेरी बनाई सृष्टि तो न जाने कहाँ गयी
लगता है उस घर को दीमक खा गयी
लड़की तो वही है न जाने किस धारा में बही है

शर्म का परदा तन से कपड़े की तरह हट गया
एक लड़की का कपड़ा अब दो में बंट गया
कल की लडकी के आदर्श श्रीराम थे
आज के तो ऋतिक ही घनश्याम है
न जाने कब थमेगा कारवां
शर्म से झुकने लगा है आसमान
तब रुकेगी वासना की आंधियां
जब लौट आयेंगे शर्म और हया